कुली मूवी रिव्यू: रजनीकांत की करिश्माई मौजूदगी के बावजूद फिल्म में नयापन की कमी
निर्देशक लोकेश कनगराज की फिल्म ‘कुली’, जिसमें रजनीकांत, श्रुति हासन और सत्यराज मुख्य भूमिकाओं में हैं, एक टेम्पलेट रिवेंज थ्रिलर है जो ज़रूरत से ज़्यादा भटकाव लेती है। कहानी बदले की भावना पर आधारित है, लेकिन अपने रास्ते से भटकने के कारण इसकी पकड़ कमजोर हो जाती है।
रजनीकांत का स्टारडम और उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस दर्शकों को कुछ हद तक बांधे रखती है, लेकिन इसके अलावा फिल्म में ऐसा कुछ खास या नया नहीं है जो लंबे समय तक असर छोड़े। पटकथा में ताजगी की कमी और कहानी के धीमे प्रवाह के कारण यह फिल्म एक साधारण अनुभव बनकर रह जाती है।
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कूली मूवी रिव्यू: रजनीकांत का करिश्मा बरकरार, लेकिन कहानी में ताज़गी की कमी
डायरेक्टर लोकेश कनगराज की कूली, जिसमें रजनीकांत, श्रुति हासन और सत्यराज मुख्य भूमिकाओं में हैं, एक टेम्पलेट रिवेंज थ्रिलर है, जो ज़रूरत से ज़्यादा मोड़ लेती है। कहानी का आधार बदले पर टिका है, लेकिन बार-बार भटकाव इसकी पकड़ को कमजोर कर देता है।
रजनीकांत की स्टार पावर और दमदार स्क्रीन प्रेज़ेंस दर्शकों को कुछ हद तक जोड़े रखती है, लेकिन इसके अलावा फिल्म में कुछ भी नया या प्रभावशाली नज़र नहीं आता। पटकथा की ताज़गी की कमी और धीमी रफ़्तार कूली को औसत सिनेमाई अनुभव बना देती है।
2025 की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक ‘कूली’ उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी
2025 का साल स्पेक्टेकल फिल्मों के लिए कुछ खास नहीं रहा है — न केवल कोलीवुड में बल्कि पूरे भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो बड़े बजट की फिल्में दर्शकों को प्रभावित करने में विफल रही हैं। इन्हीं में सबसे चर्चित रिलीज़ थी कूली, जिसे साल की सबसे बड़ी पैन-इंडिया फिल्मों में से एक बताया गया था।
बड़ी स्टारकास्ट और ज़बरदस्त प्रमोशन के साथ, फिल्म में सफलता के सारे फ़ॉर्मूले मौजूद थे — एक बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड वाला डायरेक्टर, लीड में रजनीकांत, और अलग-अलग क्षेत्रों को आकर्षित करने वाली कास्ट।
लेकिन, अपने पैमाने और चर्चा के बावजूद, फिल्म उम्मीदों के ऊंचे पायदान तक नहीं पहुंच पाई और दर्शकों को स्टाइल तो दिया, मगर उतना सब्सटेंस नहीं।
स्टाइलिश शुरुआत, लेकिन अधूरी कहानी
फिल्म कई टाइमलाइन और लोकेशन्स में घूमती है। राजशेखर (सत्यराज) की मौत उनकी बड़ी बेटी प्रीति (श्रुति हासन) और दो बहनों को संघर्ष में छोड़ देती है। राजशेखर का पुराना दोस्त देवा (रजनीकांत), जो एक हवेली चलाता है, अंतिम संस्कार में आता है, लेकिन प्रीति उसे बाहर निकाल देती है। कुछ दिनों बाद देवा को पता चलता है कि राजशेखर की मौत के पीछे और भी राज़ छिपे हैं।
इसके बाद एंट्री होती है साइमन (नागार्जुन) की, जो एक स्मगलिंग सिंडिकेट का मुखिया है और कई गैर-कानूनी काम करता है, और दयालन (सोबिन शाहिर) की, जो पोर्ट पर मजदूरों का शोषण करता है। देवा जब जांच शुरू करता है, तो कहानी उसे इस अंडरवर्ल्ड में गहराई तक खींच ले जाती है।
लोकेश कनगराज, जिन्होंने तमिल सिनेमा में नई लहर लाई, से इस फिल्म को लेकर जबरदस्त उम्मीदें थीं। लेकिन कूली उनकी सबसे कमजोर फिल्मों में गिनी जाएगी।
रजनीकांत का जलवा, मगर कहानी बोझिल
74 साल की उम्र में भी रजनीकांत का करिश्मा, हाज़िरजवाबी और स्क्रीन प्रेज़ेंस बेमिसाल है। एक क्लोज़-अप शॉट ही दर्शकों में बिजली-सा करंट भर देता है। लेकिन फिल्म में लोकेश कनगराज की पहचान वाली विजुअल स्टाइल उतनी असरदार नहीं दिखती।
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या है — अत्यधिक भरी हुई कहानी। जो फिल्म एक दोस्त की मौत का बदला लेने से शुरू होती है, वह अचानक एक कॉमन मैन बनाम क्राइम सिंडिकेट की कहानी बन जाती है। इस बदलाव में स्मूद ट्रांज़िशन की कमी महसूस होती है।
सहायक कलाकारों में नागार्जुन स्टाइलिश लगते हैं लेकिन किरदार एक-डायमेंशनल है। सोबिन शाहिर का किरदार दमदार बन सकता था, लेकिन पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हुआ। श्रुति हासन का काम बेहतरीन है और कन्ना रवि व रचिता राम छोटे रोल में भी असर छोड़ते हैं।
तकनीकी रूप से शानदार, मगर कहानी में कमज़ोर
तकनीकी तौर पर कूली लाजवाब है — गिरीश गंगाधरन की सिनेमाटोग्राफी, अनिरुद्ध रविचंदर का धड़कन बढ़ा देने वाला म्यूज़िक, साउंड डिज़ाइन, प्रोडक्शन डिज़ाइन और VFX सभी टॉप-क्लास हैं।
लेकिन, डायरेक्टर लोकेश कनगराज की यह फिल्म विचारों के ओवरलोड में फंसकर रह जाती है। अगर रजनीकांत का स्क्रीन मैजिक और अनिरुद्ध का म्यूज़िक न होता, तो फिल्म और भी कमजोर साबित होती।
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