CBI और ED जैसी एजेंसियों को झटका — बिना ठोस सबूत पूरे बैंक अकाउंट फ्रीज़ करना गैरकानूनी, अदालतों ने तय की नई सीमाएं

नई दिल्ली:
देश में हाल के न्यायिक फैसलों ने जांच एजेंसियों द्वारा बैंक खातों को फ्रीज़ करने की प्रक्रिया पर बड़ा असर डाला है। 2025–2026 के दौरान आए महत्वपूर्ण निर्णयों में स्पष्ट किया गया है कि बिना सीधे अपराध से जुड़े धन के सबूत के किसी व्यक्ति या संस्था के पूरे बैंक खाते को फ्रीज़ करना असंवैधानिक है।

दिल्ली हाई कोर्ट के फरवरी 2026 के एक अहम फैसले में यह कहा गया कि जांच एजेंसियां जैसे CBI और ED केवल उन्हीं रकम को फ्रीज़ कर सकती हैं जो कथित अपराध से सीधे जुड़ी हों। पूरे बैंक खाते को ब्लॉक करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।


मौलिक अधिकारों की सुरक्षा पर जोर
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इस तरह की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यवसाय की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन करती है। किसी व्यक्ति या व्यवसाय के पूरे खाते को रोक देना उसके आर्थिक जीवन पर सीधा प्रहार है।


ब्लैंकेट फ्रीज़ अब गैरकानूनी
हालिया फैसलों के अनुसार, “ब्लैंकेट फ्रीज़” यानी पूरे बैंक खाते को बिना भेदभाव के रोक देना अब गैरकानूनी माना गया है। अदालतों ने कहा कि एजेंसियों को केवल संदिग्ध रकम तक ही अपनी कार्रवाई सीमित रखनी होगी।


न्यायिक निगरानी अनिवार्य
नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी बैंक खाते को फ्रीज़ करने के लिए जांच एजेंसियों को मजिस्ट्रेट को सूचित करना अनिवार्य होगा। बिना न्यायिक अनुमति के की गई कार्रवाई को अवैध माना जा सकता है।


प्रक्रियात्मक न्याय का अधिकार
अदालतों ने यह भी माना कि कई मामलों में निर्दोष लोगों या व्यापारियों के खाते साइबर अपराध की जांच के दौरान फ्रीज़ कर दिए जाते हैं, जिससे उन्हें भारी नुकसान होता है। ऐसे मामलों में प्रभावित व्यक्ति को अपने खाते को डी-फ्रीज़ कराने का पूरा अधिकार है।


प्रमुख केस: संजय अग्रवाल बनाम भारत संघ (2025)
इस मामले में अदालत ने प्रॉपर्टी अटैचमेंट और ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ से जुड़े नियमों को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए। फैसले में कहा गया कि PMLA के तहत कार्रवाई करते समय एजेंसियों को तय प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन करना होगा।


कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों के अनुसार, ये फैसले नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम हैं। इससे जांच एजेंसियों की मनमानी पर रोक लगेगी और पारदर्शिता बढ़ेगी।


निष्कर्ष:
इन नए न्यायिक निर्देशों से यह साफ हो गया है कि कानून के नाम पर किसी भी व्यक्ति या संस्था के साथ अन्याय नहीं किया जा सकता। जांच जरूरी है, लेकिन वह संविधान की सीमाओं के भीतर रहकर ही की जानी चाहिए।


(न्यूज़एक्सपोज़इंडिया)
Editor-in-Chief: Vijay Kumar Chaurasiya

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